तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी
चौपाई ४, दोहा ६१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी॥ कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही॥ ४ ॥
अर्थ
हे सुन्दरी ! तब-तब तुम कोमल वाणी से पुरानी कथाएँ कह-कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगन्ध हैं, मैं यह स्वभाव से ही कहता हूँ कि मैं तुम्हें केवल माता के लिये ही घर पर रखता हूँ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद