मोहि मग चलत न होइहि हारी
मोहि मग चलत न होइहि हारी
चौपाई १, दोहा ६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी॥ सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं॥ १ ॥
अर्थ
क्षण-क्षण में आपके चरणकमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने में थकावट न होगी। हे प्रियतम! मैं सभी प्रकार से आपकी सेवा करूँगी और मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूँगी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद