को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा

चौपाई ४, दोहा ६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा॥ मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू॥ ४ ॥

अर्थ

प्रभु के साथ [रहते] मेरी ओर [आँख उठाकर] देखने वाला कौन है? (अर्थात् कोई नहीं देख सकता!) जैसे सिंह की स्त्री (सिंहनी) को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूँ और नाथ वन के योग्य हैं? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय-भोग?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम-संवाद