मातु पिता भगिनी प्रिय भाई
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई
चौपाई १, दोहा ६५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृद समुदाई॥ सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥ १ ॥
अर्थ
माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन (बन्धु-बान्धव), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र--.
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीसीता-राम-संवाद