मातु समीप कहत सकुचाहीं

चौपाई १, दोहा ६१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं॥ राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू॥ १ ॥

अर्थ

माता के सामने सीताजी से कुछ कहने में सकुचाते हैं। पर मन में यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले--हे राजकुमारी ! मेरी सिखावन सुनो। मन में कुछ दूसरी तरह न समझ लेना।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम-संवाद