नव रसाल बन बिहरनसीला
नव रसाल बन बिहरनसीला
चौपाई ४, दोहा ६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥ रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥ ४ ॥
अर्थ
नवीन आम के वन में विहार करनेवाली कोयल क्या करील के जंगल में शोभा पाती है? हे चन्द्रमुखी! हृदय में ऐसा विचार कर तुम घर ही पर रहो। वन में बड़ा कष्ट है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद