ब्याल कराल बिहग बन घोरा

चौपाई २, दोहा ६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥ डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥ २ ॥

अर्थ

वन में भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषों को चुराने वाले राक्षसों के झुंड-के-झुंड रहते हैं। वन की [भयंकरता] याद आने मात्र से धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभाव से ही डरपोक हो!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम-संवाद