हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू
चौपाई ३, दोहा ६३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥ मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥ ३ ॥
अर्थ
हे हंसगमनी! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे (बुरा कहेंगे)। मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जी सकती है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद