मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं
चौपाई ४, दोहा ६४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥ ४ ॥
अर्थ
परन्तु मैंने मन में समझकर देख लिया कि पति के वियोग के समान जगत में कोई दुःख नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीसीता-राम-संवाद