सम महि तृन तरुपल्लव डासी
सम महि तृन तरुपल्लव डासी
चौपाई ३, दोहा ६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाय पलोटिहि सब निसि दासी॥ बार बार मृदु मूरति जोही। लागिहि तात बयारि न मोही॥ ३ ॥
अर्थ
समतल भूमि पर घास और पेड़ों के पत्ते बिछाकर यह दासी रात भर आपके चरण दबाएगी। बार-बार आपकी कोमल मूर्ति को देखकर मुझको गरम हवा भी न लगेगी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद