बन दुख नाथ कहे बहुतेरे

चौपाई ३, दोहा ६६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे॥ प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना॥ ३ ॥

अर्थ

हे नाथ! आपने वन के बहुत-से दुःख और बहुत-से भय, विषाद और संताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु (आप) के वियोग [से होनेवाले दुःख] के लवलेश के समान भी नहीं हो सकते।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम-संवाद