कंदर खोह नदीं नद नारे
कंदर खोह नदीं नद नारे
चौपाई ४, दोहा ६२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥ भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥ ४ ॥
अर्थ
पर्वतों की गुफाएँ, खोह (दर्रे), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देख तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िए, सिंह और नाग ऐसे [भयानक] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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श्रीसीता-राम-संवाद