कुस कंटक मग काँकर नाना

चौपाई ३, दोहा ६२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥ चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥ ३ ॥

अर्थ

रास्ते में कुश, काँट और बहुत-से कंकड़ हैं। उन पर बिना जूते के पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्ते में बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीसीता-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सीताजी का वनगमन का दृढ़ निश्चय और श्रीराम से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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श्रीसीता-राम-संवाद