कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे
चौपाई १, दोहा १०७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥ कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥ १ ॥
अर्थ
कुशल प्रश्न करके मुनिराज ने उनको आसन दिये और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृत के ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “प्रयाग में भरद्वाज से भेंट” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज मुनि से श्रीराम की भेंट और यमुनातट निवासियों के प्रेम का वर्णन है।
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प्रयाग में भरद्वाज से भेंट