अति लालसा बसहिं मन माहीं
अति लालसा बसहिं मन माहीं
चौपाई २, दोहा ११० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं॥ जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने॥ २ ॥
अर्थ
उनके मन में [परिचय जानने की] बहुत-सी लालसाएँ भरी हैं। पर वे नाम-गाँव पूछते सकुचाते हैं। उन लोगों में जो वयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्ति से श्रीरामचन्द्रजी को पहचान लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “प्रयाग में भरद्वाज से भेंट” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में प्रयाग में भरद्वाज मुनि से श्रीराम की भेंट और यमुनातट निवासियों के प्रेम का वर्णन है।
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प्रयाग में भरद्वाज से भेंट