जेहिं बन जाइ रहब रघुराई

चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥ तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥ ३ ॥

अर्थ

हे रघुराई! जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी बना दूँगा। तब मुझे जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर की दुहाई है, मैं वही करूँगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार