नाथ आजु मैं काह न पावा

चौपाई ३, दोहा १०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥ ३ ॥

अर्थ

[उसने कहा--] हे नाथ! आज मैंने क्‍या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। आज विधि ने बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार