मागी नाव न केवटु आना

चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥ २ ॥

अर्थ

श्रीराम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाया नहीं। वह कहने लगा--मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलों की धूल के लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार