पिय हिय की सिय जाननिहारी
पिय हिय की सिय जाननिहारी
चौपाई २, दोहा १०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥ २ ॥
अर्थ
पति के हृदय की जाननेवाली सीताजी ने आनन्दभरे मन से अपनी रत्नजटित अँगूठी अँगुली से उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।
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केवट का प्रेम और गंगा पार