पति देवर सँग कुसल बहोरी

चौपाई २, दोहा १०३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥ २ ॥

अर्थ

जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौटकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजी की प्रेमरस में सनी हुई विनती सुनकर तब गंगा जी के निर्मल जल से श्रेष्ठ वाणी हुई--

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार