तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा

चौपाई १, दोहा १०३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥ सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥ १ ॥

अर्थ

फिर रघुकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जोड़कर गंगा जी से कहा--हे माता! मेरा मनोरथ पूरा करियेगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार