जासु बियोग बिकल पसु ऐसें
जासु बियोग बिकल पसु ऐसें
चौपाई १, दोहा १०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥ बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥ १ ॥
अर्थ
जिनके वियोग में पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजी ने जबर्दस्ती सुमन्त्र को लौटाया। तब आप गंगा जी के तीर पर आये।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।
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केवट का प्रेम और गंगा पार