छुअत सिला भइ नारि सुहाई
छुअत सिला भइ नारि सुहाई
चौपाई ३, दोहा १०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥ तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥ ३ ॥
अर्थ
जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [मेरी नाव तो काठ की है]। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोज़ी मारी जायगी] (मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जायगी)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।
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केवट का प्रेम और गंगा पार