उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता

चौपाई १, दोहा १०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ

निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नाव से] उतरकर गंगा जी की रेत में खड़े हो गये। तब केवट ने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर] प्रभु को संकोच हुआ कि इसे कुछ दिया नहीं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।

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केवट का प्रेम और गंगा पार