पद नख निरखि देवसरि हरषी
चौपाई ३, दोहा १०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥ केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥ ३ ॥
अर्थ
प्रभु के इन वचनों को सुनकर देवनदी गंगा जी की बुद्धि मोह से खिंच गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कर रहे हैं ]। परन्तु [समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान] पदनखों को देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गंगा जी हर्षित हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “केवट का प्रेम और गंगा पार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में केवट द्वारा प्रभु के चरण पखारने और श्रीराम-सीता-लक्ष्मण को गंगा पार उतारने का वर्णन है।