लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान
लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान
छन्द १, दोहा १२१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती। बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती॥ अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे। सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते॥ १ ॥
अर्थ
सुजानों के राजा, लक्ष्मीकान्त, कृपानिधान भगवान् ने उसको हृदय से लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी। वह विनती करने लगा—आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शंकरजी से सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ। हे सुखधाम! हे पूर्णकाम श्रीरामजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान” प्रकरण का छन्द १, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-रामजी का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या की ओर आनंदमयी प्रस्थान का वर्णन है।
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पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान