सब भाँति अधम निषाद सो हरि

छन्द २, दोहा १२१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो। मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो॥ यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा। कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा॥ २ ॥

अर्थ

सब प्रकार से नीच उस निषाद को भगवान् ने भरतजी की भाँति हृदय से लगा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस मन्दबुद्धि ने (मैंने) मोहवश उस प्रभु को भुला दिया। रावण के शत्रु का यह पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजी के चरणों में प्रीति उत्पन्न करनेवाला है। यह कामादि विकारों को हरनेवाला और [भगवान् के स्वरूप का] विशेष ज्ञान उत्पन्न करनेवाला है। देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान” प्रकरण का छन्द २, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-रामजी का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या की ओर आनंदमयी प्रस्थान का वर्णन है।

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पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान