परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी

चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा॥ ४ ॥

अर्थ

अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्धित) वायु चलने लगी। समुद्र, सरोवर और नदियों का जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-रामजी का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या की ओर आनंदमयी प्रस्थान का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान