तीरथपति पुनि देखु प्रयागा
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा
चौपाई ४-५, दोहा १२० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा॥ देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी॥ पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि॥ ४-५ ॥
अर्थ
फिर तीर्थराज प्रयाग को देखो, जिसके दर्शन से ही करोड़ों जन्मों के पाप भाग जाते हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणी जी के दर्शन करो, जो शोकों को हरनेवाली और हरि लोक पहुँचने की सीढ़ी के समान है। फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरी के दर्शन करो, जो तीनों प्रकार के तापों और भव (आवागमनरूपी) रोग का नाश करनेवाली है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ४-५, दोहा १२० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-रामजी का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या की ओर आनंदमयी प्रस्थान का वर्णन है।
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पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान