दीन्हि असीस हरषि मन गंगा
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा
चौपाई ५, दोहा १२१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
दीन्हि असीस हरषि मन गंगा। सुंदरि तव अहिवात अभंगा॥ सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल। आयउ निकट परम सुख संकुल॥ ५ ॥
अर्थ
गंगाजी ने मन में हर्षित होकर आशीर्वाद दिया—हे सुन्दरी! तुम्हारा सुहाग अखण्ड हो। भगवान् के तट पर उतरने की बात सुनते ही निषादराज गुह प्रेम में विह्वल होकर दौड़ा। परम सुख से परिपूर्ण होकर वह प्रभु के समीप आया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १२१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीसीता-रामजी का पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या की ओर आनंदमयी प्रस्थान का वर्णन है।
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पुष्पक विमान से अयोध्या प्रस्थान