सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ

दोहा ४ · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥ ४ ॥

अर्थ

सेतुबन्ध पर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्ग से उड़ने लगे और दूसरे [कितने ही] जलचर जीवों पर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना” प्रकरण का दोहा ४ है। इस प्रकरण में नल-नील द्वारा सेतु निर्माण और श्रीरामेश्वर की स्थापना का वर्णन है।

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सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना