प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे

चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥ तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥ ४ ॥

अर्थ

वे सब [वैर-विरोध भूलकर] प्रभु के दर्शन कर रहे हैं, हटाने से भी नहीं हटते। सब के मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी ओट के कारण जल नहीं दिखाई पड़ता। वे सब भगवान् का रूप देखकर [आनन्द और प्रेम में] मग्न हो गये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नल-नील द्वारा सेतु निर्माण और श्रीरामेश्वर की स्थापना का वर्णन है।

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सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना