मकर नक्र नाना झष ब्याला

चौपाई ३, दोहा ४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥ ३ ॥

अर्थ

बहुत तरह के मगर, नक्र (घड़ियाल), मछलियाँ और साँप थे, जिनके शरीर सौ योजन के और परम विशाल थे। कुछ ऐसे भी थे जो उनको भी खा जाते हैं। किसी-किसी के डर से वे भी डर रहे थे।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नल-नील द्वारा सेतु निर्माण और श्रीरामेश्वर की स्थापना का वर्णन है।

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सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना