सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि
सोरठा ० (ग) · लंकाकाण्ड
सोरठा पाठ
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं॥ ० (ग) ॥
अर्थ
जाम्बवान् ने हाथ जोड़कर कहा-हे सूर्यकुल के ध्वजा-स्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! [सबसे बड़ा] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसाररूपी समुद्र से पार हो जाते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना” प्रकरण का सोरठा ० (ग) है। इस प्रकरण में नल-नील द्वारा सेतु निर्माण और श्रीरामेश्वर की स्थापना का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना