होइ अकाम जो छल तजि सेइहि
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि
चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥ २ ॥
अर्थ
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतु का दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जायगा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नल-नील द्वारा सेतु निर्माण और श्रीरामेश्वर की स्थापना का वर्णन है।
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सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना