स्वामि काज करिहउँ रन रारी
स्वामि काज करिहउँ रन रारी
चौपाई ३, दोहा १९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥ ३ ॥
अर्थ
मैं स्वामी के काम के लिये रण में लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं (अर्थात् जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूंगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।
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निषाद की शंका और सावधानी