बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी
चौपाई ३, दोहा १९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥ रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ
एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा-भरत से मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।
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निषाद की शंका और सावधानी