अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं

चौपाई ३, दोहा १९१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥ एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥ ३ ॥

अर्थ

कवच पहनकर सिर पर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, बाँस तथा सेल को सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवार के वार रोकने में अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग में भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद (उछल) रहे हों।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १९१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।

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निषाद की शंका और सावधानी