गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ
दोहा १९२ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ॥ १९२ ॥
अर्थ
अतएव हे वीरो! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटों को रोक लो, मैं जाकर भरतजी से मिलकर उनका मर्म लेता हूँ। उनका भाव मित्र का है या शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब आकर वैसा (उसी के अनुसार) प्रबन्ध करूँगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का दोहा १९२ है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।
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निषाद की शंका और सावधानी