साधु समाज न जाकर लेखा
साधु समाज न जाकर लेखा
चौपाई ४, दोहा १९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥ जायँ जिअत जग सो महिभारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥ ४ ॥
अर्थ
साधुओं के समाज में जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं, वह जगत् में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माता के यौवनरूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ा मात्र है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।
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निषाद की शंका और सावधानी