होहु सँजोइल रोकहु घाटा

चौपाई १, दोहा १९० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥ १ ॥

अर्थ

सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साज सजा लो (अर्थात्‌ भरत से युद्ध में लड़कर मरने के लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरत से सामने (मैदान में) लोहा लूँगा (मुठभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गंगापार न उतरने दूँगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।

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निषाद की शंका और सावधानी