राम प्रताप नाथ बल तोरे

चौपाई १, दोहा १९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥ जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥ १ ॥

अर्थ

हे नाथ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना भट और बिना घोड़े की कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़े को मार डालेंगे)। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ों से छा देंगे)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “निषाद की शंका और सावधानी” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत की सेना देख निषादराज गुह की शंका और सावधानी का वर्णन है।

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निषाद की शंका और सावधानी