भरत हृदयँ सिय राम निवासू

चौपाई ४, दोहा २९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥ अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥ ४ ॥

अर्थ

भरतजी के हृदय में श्रीसीतारामजी का निवास है। जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ कहीं अँधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल होता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।

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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना