रामु सनेह सकोच बस कह ससोच

दोहा २९४ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराजु। रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु॥ २९४ ॥

अर्थ

देवराज इन्द्र सोच में भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह और संकोच के वश हैं। इसलिये सब लोग मिलकर कुछ प्रपञ्च (माया) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा [ही समझो]।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का दोहा २९४ है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।

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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना