करि कुचालि सोचत सुरराजू
करि कुचालि सोचत सुरराजू
चौपाई १, दोहा २९६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥ गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥ १ ॥
अर्थ
कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना-बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है। इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ठ आदि के साथ] श्रीरघुनाथजी के पास गये। सूर्यकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी ने सबका सम्मान किया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना