राम भगतिमय भरतु निहारे
राम भगतिमय भरतु निहारे
चौपाई ४, दोहा २९४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥ सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥ ४ ॥
अर्थ
और तब श्रीरामभक्तिमय भरतजी को देखा। इन सब को देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदय में हार मान गये (निराश हो गये)। उन्होंने सब किसी को श्रीरामप्रेम में सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोच के वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना