सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे

चौपाई १, दोहा २९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥ सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥ १ ॥

अर्थ

मुनि वसिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्र हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया (अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये)। वे प्रेम से शिथिल हो गये और मन में विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।

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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना