बिधि हरि हर माया बड़ि भारी
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी
चौपाई ३, दोहा २९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥ सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥ ३ ॥
अर्थ
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धि को तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावे में डाल दो)! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्य को चुरा सकती है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना