रामहि रायँ कहेउ बन जाना
रामहि रायँ कहेउ बन जाना
चौपाई २, दोहा २९२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥ हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥ २ ॥
अर्थ
राजा दशरथजी ने श्रीरामजी को वन जाने के लिये कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम को प्रमाणित (सच्चा) कर दिया (प्रियवियोग में प्राण त्याग दिये)। परन्तु हम अब इन्हें वन से [और गहन] वन को भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए लौटेंगे [कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वन में छोड़कर चले आये, दशरथजी की तरह मरे नहीं]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना