बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी
चौपाई २, दोहा २९५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥ मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥ २ ॥
अर्थ
देवताओं की विनती सुनकर और देवताओं को स्वार्थ के वश होने से मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं--मुझसे कह रहे हो कि भरतजी की मति पलट दो! हजार नेत्रों से भी तुम्हें सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में जनक-वसिष्ठ संवाद, इन्द्र की चिंता और सरस्वती द्वारा उनके संशय-निवारण का वर्णन है।
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जनक-वसिष्ठ संवाद, सरस्वती द्वारा इन्द्र को समझाना